Meta Description: बिहार में सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण (SIR) पर बवाल। जानिए क्यों चुनाव आयोग ने कहा कि उसे इसकी सूचना नहीं है? कहाँ हैं वो फाइलें और दस्तावेज़ जिनके बिना सरकारी काम असंभव है? पूरी जानकारी पढ़ें।
प्रस्तावना: एक सवाल जो दिमाग़ को कुरेदता है
"बिहार में SIR (सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण) हो रहा है। इसके आदेश से पहले आयोग में बैठक को तो हुई होगी। किसी ने फाइलें लिखी होगीं। दूसरे विभागों से राय ली गई होगी। इसके बिना तो सरकारी काम हो ही नहीं सकता..."
ये पंक्तियाँ हर उस व्यक्ति के मन में उठ रहे सवाल को दर्शाती हैं जो सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली को थोड़ा-बहुत भी समझता है। कोई भी बड़ा सरकारी फैसला, खासकर जनसंख्या से जुड़ा एक संवेदनशील सर्वेक्षण, अचानक आसमान से नहीं टपकता। यह एक लंबी प्रक्रिया का नतीजा होता है। फाइलों पर फाइलें बनती हैं, नोट्स लिखे जाते हैं, बैठकें होती हैं, और अनुमतियाँ ली जाती हैं।
लेकिन जब इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठता है और चुनाव आयोग जैसा एक संवैधानिक संस्थान यह कहता है कि उसे इस बारे में "कोई सूचना नहीं" है, तो यह सिर्फ एक जवाब नहीं, एक बड़ा विरोधाभास बन जाता है। आखिर यह 'सूचना नहीं' का अंधेरा क्यों है? कहाँ हैं वो दस्तावेज़?
बिहार सरकार द्वारा शुरू किया गया सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण (Socio-Economic Survey) या SIR, मूल रूप से राज्य के हर परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति का एक ब्यौरा इकट्ठा करने का अभियान है। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य योजनाओं को बेहतर ढंग से लागू करना और वंचित तबके तक सही लाभ पहुँचाना है।
हालाँकि, विपक्ष और आलोचकों का मानना है कि यह जाति आधारित जनगणना का ही एक रूप है, जिसे चुनावी लाभ के लिए किया जा रहा है। चुनाव आयोग के सामने यही सवाल उठाया गया कि क्या चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद इस तरह का सर्वेक्षण करना उचित है?
चुनाव आयोग का 'सूचना नहीं' वाला जवाब: एक पहेली
चुनाव आयोग ने इस मामले में जो जवाब दिया, वह हैरान करने वाला था। आयोग ने कहा कि उसे बिहार सरकार की ओर से इस सर्वेक्षण के बारे में कोई आधिकारिक सूचना या (communication) नहीं मिली है।
यहीं वह point है जहाँ आम आदमी का दिमाग कंप्यूटर की तरह '404 Error - File Not Found' दिखाने लगता है।
2. अंतर्विभागीय consultation: SIR जैसे सर्वेक्षण में कई विभाग शामिल होते हैं - गृह विभाग, वित्त विभाग, सांख्यिकी विभाग, आदि। क्या सभी विभागों ने बिना किसी फाइल नोट के ही अपनी सहमति दे दी? क्या सभी मंत्रालयों ने बिना कागज़ात के काम कर दिया?
3. बजट का सवाल: इस सर्वेक्षण पर खर्च होने वाला पैसा? क्या बजट का allocation बिना किसी लिखित प्रस्ताव के हुआ? यह वित्त मंत्रालय के नियमों के खिलाफ़ है।
यहाँ कई possibilities हैं:
1. सूचना का अभाव (Information Gap): हो सकता है कि बिहार सरकार ने वास्तव में चुनाव आयोग को इसकी औपचारिक सूचना न भेजी हो। अगर ऐसा है, तो यह एक गंभीर procedural lapse है। चुनावी period में होने वाले ऐसे बड़े कार्यों के बारे में आयोग को inform करना जरूरी होता है।
2. रिकॉर्ड की कमी (Missing Records): possibility यह भी है कि सूचना भेजी गई, लेकिन वह आयोग के पास proper channel से नहीं पहुँची या कहीं lost हो गई। हालाँकि, यह भी एक संवैधानिक संस्था के लिए एक गंभीर चूक होगी।
3. तकनीकी बचाव (Technical Defense): आयोग का "सूचना नहीं है" कहना एक तरह का technical response हो सकता है। हो सकता है उनके पास कोई ऐसा आधिकारिक पत्र न हो जिसे वे 'सूचना' का दर्जा दे सकें, जबकि अनौपचारिक communication हुआ हो।
4. पारदर्शिता का संकट (Transparency Crisis): सबसे चिंताजनक possibility यह है कि जानबूझकर दस्तावेज़ों को सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है। क्या किसी दबाव में ऐसा किया जा रहा है? क्या इसे सार्वजनिक करने से कोई ऐसी जानकारी उजागर हो जाएगी जो awkward questions पैदा कर सकती है?
आम जनता के लिए इसके क्या मायने हैं?
यह मामला सिर्फ एक सर्वेक्षण या राजनीतिक झड़प से कहीं आगे की बात है। यह हमारे लोकतंत्र की नींव से जुड़े सिद्धांतों पर सवाल उठाता है।
- पारदर्शिता (Transparency): सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लोकतंत्र की आधारशिला है। जब बड़े फैसलों के पीछे के दस्तावेज़ गायब हो जाएँ या 'सूचना नहीं' का बयान आए, तो यह पारदर्शिता के सिद्धांत पर चोट है।
- जवाबदेही (Accountability): कोई भी संस्थान या सरकार अपने कार्यों के लिए जवाबदेह तभी हो सकती है जब उसके हर कदम का रिकॉर्ड मौजूद हो। रिकॉर्ड के अभाव में जवाबदेही तय करना नामुमकिन हो जाता है।
- जनता का अधिकार (Public Right): देश के हर नागरिक को यह जानने का अधिकार है कि उसकी सरकार कैसे काम कर रही है, उसके पैसे कैसे खर्च हो रहे हैं। RTI (सूचना का अधिकार) कानून इसी अधिकार की रक्षा करता है।
लेकिन, जब तक उन फाइलों और दस्तावेजों पर से रहस्य का पर्दा नहीं उठता, जिनके आधार पर SIR जैसे बड़े अभियान का फैसला लिया गया, तब तक आम जनता के मन में यह सवाल बना रहेगा। "सूचना नहीं है" का जवाब एक अंतिम जवाब नहीं हो सकता।
लोकतंत्र में जनता की जिज्ञासा ही सबसे बड़ी ताकत है। यह जिज्ञासा ही सत्ता को जवाबदेह बनाए रखती है। इसलिए, इस 'सूचना नहीं' के अंधेरे को जल्द से जल्द दूर किया जाना चाहिए। फाइलें कहाँ हैं, यह सवाल ज़ायज़ है और इसका जवाब मिलना ही चाहिए।
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