प्रस्तावना
हाल के दिनों में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा टैरिफ को लेकर दिए गए बयानों ने वैश्विक राजनीति और आर्थिक बहस को गर्म कर दिया है। इस बीच भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा, जिसे अक्सर गोदी मीडिया कहा जाता है, एक बार फिर मोदी सरकार के बचाव में कूद पड़ा है। दिलचस्प यह है कि ट्रम्प का यह मुद्दा सीधा भारत की अर्थव्यवस्था और व्यापारिक हितों से जुड़ा है, फिर भी इसे बीजेपी बचाओ अभियान का रंग दे दिया गया।
ट्रम्प का टैरिफ और भारत पर असर
डोनाल्ड ट्रम्प हमेशा से ही अमेरिका-फर्स्ट की नीति के लिए जाने जाते रहे हैं। उनके कार्यकाल में चीन, यूरोप और भारत जैसे देशों पर भारी टैरिफ लगाए गए थे। अब एक बार फिर से उन्होंने टैरिफ बढ़ाने की धमकी देकर वैश्विक व्यापार जगत को चिंता में डाल दिया है। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह बड़ा झटका है क्योंकि टैरिफ से सीधे-सीधे भारतीय निर्यातक और उद्योग प्रभावित होते हैं।
मोदी सरकार पर सीधा सवाल क्यों?
भारत की आर्थिक नीतियों और विदेशी व्यापार समझौतों को लेकर विपक्ष अक्सर मोदी सरकार पर सवाल उठाता रहा है। ट्रम्प के टैरिफ बयान के बाद यह चर्चा स्वाभाविक थी कि क्या मोदी सरकार ने भारत के हितों की रक्षा के लिए मजबूत रणनीति अपनाई है या नहीं। ऐसे समय में मीडिया की भूमिका होनी चाहिए थी कि वह दोनों पक्षों—सरकार और आलोचकों—की बात सामने रखे।
गोदी मीडिया की बौखलाहट
लेकिन हुआ इसके उलट। कई प्रमुख टीवी चैनलों और अखबारों ने इस मुद्दे को तथ्यों से ज्यादा भावनाओं और राष्ट्रवाद के चश्मे से दिखाना शुरू कर दिया। बहसों में सवाल यह नहीं उठे कि भारतीय उद्योगों को टैरिफ से कितना नुकसान होगा, बल्कि यह दिखाया गया कि ट्रम्प की नाराज़गी मोदी के खिलाफ एक विदेशी षड्यंत्र है। इस तरह चर्चा का केंद्र बदल गया और असली मुद्दा पीछे छूट गया।
‘बीजेपी बचाओ अभियान’ कैसे बना?
गोदी मीडिया पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि वह सरकार की छवि को चमकाने में जुटी रहती है। इस बार भी वही पैटर्न दिखा। बहस के विषय इस तरह घुमाए गए कि जनता को लगे मानो ट्रम्प का टैरिफ निर्णय भारत नहीं बल्कि सीधे मोदी के खिलाफ है। परिणामस्वरूप यह मुद्दा आर्थिक से ज्यादा राजनीतिक हो गया। यही कारण है कि आलोचक इसे बीजेपी बचाओ अभियान कह रहे हैं।
विपक्ष का रुख
कांग्रेस, वाम दलों और अन्य विपक्षी नेताओं ने साफ कहा कि टैरिफ का मसला राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। इसे ‘मोदी बनाम ट्रम्प’ का रंग देना जनता को गुमराह करना है। विपक्ष ने यह भी कहा कि सरकार को चाहिए कि वह अमेरिकी प्रशासन से कूटनीतिक स्तर पर ठोस बातचीत करे और भारतीय उद्योगों की सुरक्षा सुनिश्चित करे।
जनता की प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया पर आम लोगों ने भी गोदी मीडिया की इस कवरेज पर जमकर तंज कसे। ट्विटर (X) और फेसबुक पर ट्रेंड चला—#बीजेपीबचाओअभियान। कई लोगों ने लिखा कि मीडिया का काम सरकार का प्रवक्ता बनना नहीं, बल्कि जनता के हितों की रक्षा करना है। खासकर युवा वर्ग में इस मुद्दे को लेकर असंतोष देखा गया।
ट्रम्प बनाम मोदी: असली कहानी
सच्चाई यह है कि ट्रम्प के बयानों का असर केवल भारत ही नहीं बल्कि कई देशों पर पड़ेगा। वे हर देश से चाहते हैं कि अमेरिका को ज्यादा फायदा मिले। मोदी सरकार को इस चुनौती से कूटनीतिक और आर्थिक रणनीति से निपटना होगा। लेकिन जब मीडिया इसे केवल राजनीति का चश्मा पहनाकर दिखाएगा तो असली समाधान पीछे रह जाएगा।
निष्कर्ष
टैरिफ जैसे गंभीर आर्थिक मुद्दे को जब मीडिया ‘बीजेपी बचाओ अभियान’ में बदल देती है तो लोकतंत्र की जड़ों पर चोट होती है। जनता को असली जानकारी से दूर रखना लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ अन्याय है। सरकार की आलोचना करना या उसकी नीतियों पर सवाल उठाना देशद्रोह नहीं है, बल्कि यही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है।
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